हिन्दी में कुछ लिखने की कोशिश
कभी यूँ ही सोचते सोचते
कुछ काम करते करते
कभी काम के बीच में
एक समय ऐसा आता है
जब आदमी कहीं खो सा जाता है
पता नहीं किधर, पता नहीं क्यूँ
ये समय रोज़ एक बार ज़रूर आता है
ऐसा नहीं कि किसी पसंदीदा काम में नहीं आता है
पर उसमे इत्तेफ़ाक़ से कुछ कम आता है
क्या होता है ये
क्यूँ होता है ये
कुछ पता नहीं
पर जो भी होता है
ऐसा कुछ होता है
जो शब्दों में बयाँ होता नहीं
कुछ हममें से ही ऐसे पागल से होते हैं
जो असल दुनिया के बजाए
उस खो जाने वाली दुनिया में रहते हैं
जहाँ इस दुनिया जैसा शोर नहीं
पर इस दुनिया जैसी भोर भी नहीं
कुछ अलग दुनिया है वो
जहाँ रहना तो संभव नहीं
पर शायद वहां होना मुमकिन है
काश उस दुनिया का हिस्सा सब बन पाते
और जो हिस्सा हैं वो उसकी एहमियत समझ पाते,
सबको जीवन में मौके हज़ार मिलते
उस दुनिया को अपनी असल दुनिया बनाने के
काश वो उस समय समझ पाते
कि जहाँ वो खो रहे थे
वो असल में वहां हो सकते हैं
वो उसे अपने भविष्य का आईना समझ पाते
तो कहाँ से कहाँ पहुँच जाते
मगर अब कुछ अलग हो रहा है हमारी असल दुनिया में
लोग हैं कुछ और, और हमे कुछ और दिखा रहे
पर असल दुख तो ये है कि
नई पीढ़ी उन्हे ही अपने होने वाली दुनिया का आईना मान रही
वो दुनिया जो आदमी अपने अनुभव से बनाता
रोज़ उसमे कुछ बदलाव पाता
लेकिन मूल भाव अपने ही अंदर से लाता
ये सब किस दिशा हमे ले जाएगा देखना होगा
उसके बाद जो भी होगा सहना होगा
पर जो भी हो, एक बात तो तये है
उस दुनिया को अपनी असल दुनिया बनाने के लिए
हमे रोज़ाना काम तो करना होगा
क्या?, पता नहीं
क्यू?, पता नहीं
शायद बिना कुछ किये मन चाही चीज़ पाने के हम हकदार ना होंगे
इसलिए करना होगा
या शायद इस दुनिया का एक बहुत छोटा सा कण होने की वजह से
और इस दुनिया का एक बहुत छोटा सा कण बनके ही न रह जाए
इसलिए करना होगा
पर हम सबको कुछ ना कुछ तो करना होगा
Comments
Post a Comment